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रात्री॒ व्य॑ख्यदाय॒ती पु॑रु॒त्रा दे॒व्य१॒॑क्षभिः॑
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विश्वा॒ अधि॒ श्रियो॑ऽधित
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ओर्व॑प्रा॒ अम॑र्त्या नि॒वतो॑ दे॒व्यु१॒॑द्वतः॑
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ज्योति॑षा बाधते॒ तमः॑
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निरु॒ स्वसा॑रमस्कृतो॒षसं॑ दे॒व्या॑य॒ती
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अपेदु॑ हासते॒ तमः॑
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सा नो॑ अ॒द्य यस्या॑ व॒यं नि ते॒ याम॒न्नवि॑क्ष्महि
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वृ॒क्षे न व॑स॒तिं वयः॑
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नि ग्रामा॑सो अविक्षत॒ नि प॒द्वन्तो॒ नि प॒क्षिणः॑
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नि श्ये॒नास॑श्चिद॒र्थिनः॑
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या॒वया॑ वृ॒क्यं१॒॑ वृकं॑ य॒वय॑ स्ते॒नमू॑र्म्ये
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अथा॑ नः सु॒तरा॑ भव
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उप॑ मा॒ पेपि॑श॒त्तमः॑ कृ॒ष्णं व्य॑क्तमस्थित
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उष॑ ऋ॒णेव॑ यातय
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उप॑ ते॒ गा इ॒वाक॑रं वृणी॒ष्व दु॑हितर्दिवः
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रात्रि॒ स्तोमं॒ न जि॒ग्युषे॑
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